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बिना तोड़-फोड़ के वास्तु दोष दूर करने के उपाय
एक सुंदर एवं दोषमुक्त घर हर व्यक्ति की कामना होती है। किंतु वास्तु विज्ञान के पर्याप्त ज्ञान के अभाव में भवन निर्माण में कुछ अशुभ तत्वों तथा वास्तु दोषों का समावेश हो जाता है। फलतः गृहस्वामी को विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। घर के निर्माण के बाद फिर से उसे तोड़कर दोषों को दूर करना कठिन होता है। ऐसे में हमारे ऋषि-मुनियों ने बिना तोड़-फोड़ किए इन दोषों को दूर करने के कुछ उपाय बताए हैं। उन्होंने प्रकृति की अनमोल देन सूर्य की किरणों, हवा और पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति आदि के उचित उपयोग की सलाह दी है। यहां वास्तु दोषों के निवारण के निमित्त कुछ उपाय प्रस्तुत हैं जिन्हें अपना कर विभिन्न दिशाओं से जुड़े दोषों को दूर किया जा सकता है। ईशान दिशा
यदि ईशान क्षेत्र की उत्तरी या पूर्वी दीवार कटी हो, तो उस कटे हुए भाग पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन का ईशान क्षेत्र प्रतीकात्मक रूप से बढ़ जाता है।
यदि ईशान कटा हो अथवा किसी अन्य कोण की दिशा बढ़ी हो, तो किसी साधु पुरुष अथवा अपने गुरु या बृहस्पति ग्रह या फिर ब्रह्मा जी का कोई चित्र अथवा मूर्ति या कोई अन्य प्रतीक चिह्न ईशान में रखें। गुरु की सेवा करना सर्वोत्तम उपाय है। बृहस्पति ईशान के स्वामी और देवताओं के गुरु हैं। कटे ईशान के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए साधु पुरुषों को बेसन की बनी बर्फी या लड्डुओं का प्रसाद बांटना चाहिए।
यह क्षेत्र जलकुंड, कुआं अथवा पेयजल के किसी अन्य स्रोत हेतु सर्वोत्तम स्थान है। यदि यहां जल हो, तो चीनी मिट्टी के एक पात्र में जल और तुलसीदल या फिर गुलदस्ता अथवा एक पात्र में फूलों की पंखुड़ियां और जल रखें। शुभ फल की प्राप्ति के लिए इस जल और फूलों को नित्य प्रति बदलते रहें।
अपने शयन कक्ष की ईशान दिशा की दीवार पर भोजन की तलाश में उड़ते शुभ पक्षियों का एक सुंदर चित्र लगाएं। कमाने हेतु बाहर निकलने से हिचकने वाले लोगों पर इसका चमत्कारी प्रभाव होता है। यह अकर्मण्य लोगों में नवीन उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है।
बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ योगी की मुद्रा में बैठे महादेव शिव का ऐसा फोटो, चित्र अथवा मूर्ति स्थापित करें, जिसमें उनके भाल पर चंद्रमा हो और लंबी जटाओं से गंगा जी निकल रही हों।
ईशान में विधिपूर्वक बृहस्पति यंत्र की स्थापना करें।
पूर्व दिशा
यदि पूर्व की दिशा कटी हो, तो पूर्वी दीवार पर एक बड़ा शीशा लगाएं। इससे भवन के पूर्वी क्षेत्र में प्रतीकात्मक वृद्धि होती है।
पूर्व की दिशा के कटे होने की स्थिति में वहां सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य देव की एक तस्वीर, मूर्ति अथवा चिह्न रखें।
सूर्योदय के समय सूर्य भगवान को जल का अर्य दें। अर्य देते समय गायत्री मंत्र का सात बार जप करें। पुरूष अपने पिता और स्त्री अपने स्वामी की सेवा करें। प्रत्येक कक्ष के पूर्व में प्रातःकालीन सूर्य की प्रथम किरणों के प्रवेश हेतु एक खिड़की होनी चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं हो, तो उस भाग में सुनहरी या पीली रोशनी देने वाला बल्ब जलाएं।
पूर्व में लाल, सुनहरे और पीले रंग का प्रयोग करें। पूर्वी क्षेत्र में मिट्टी खोदकर जलकुंड बनाएं और उसमें लाल कमल उगाएं अथवा पूर्वी बगीचे में लाल गुलाब रोपें। अपने शयन कक्ष की पूर्वी दीवार पर उदय होते हुए सूर्य की ओर पंक्तिबद्ध उड़ते हुए हंस, तोता, मोर आदि अथवा भोजन की तलाश में अपना घोंसला छोड़ने को तैयार शुभ पक्षियों का चित्र लगाएं। अकर्मण्य और कमाने हेतु बाहर जाने से हिचकने वाले व्यक्तियों के लिए यह जादुई छड़ी के समान काम करता है।
बंदरों को गुड़ और भुने चने खिलाएं।
पूर्व में सूर्य यंत्र की स्थापना विधि विधान पूर्वक करें। आग्नेय दिशा
यदि आग्नेय कोण पूर्व दिशा में बढ़ा हो, तो इसे काटकर वर्गाकार या आयताकार बनाएं।
शुद्ध बालू और मिट्टी से आग्नेय क्षेत्र के सभी गड्ढे इस प्रकार भर दें कि यह क्षेत्र ईशान और वायव्य से ऊंचा लेकिन नैर्ऋत्य से नीचा रहे।
यदि आग्नेय किसी भी प्रकार से कटा हो अथवा पर्याप्त रूप से खुला न हो, तो इस दिशा में लाल रंग का एक दीपक या बल्ब अग्नि देवता के सम्मान में कार्य करते समय कम से कम एक प्रहर (तीन घंटे) तक जलाए रखें।
यदि आग्नेय कटा हो, तो इस दिशा में अग्नि देव की एक तस्वीर, मूर्ति या संकेत चिह्न रखें। गणेश जी की तस्वीर या मूर्ति रखने से भी उक्त दोष दूर होता है।
अग्नि देव की स्तुति में ऋग्वेद में उल्लिखित पवित्र मंत्रों का उच्चारण करें।
आग्नेय कोण में दोष होने पर वहां भोजन में प्रयोग होने वाले फल, सब्जियां (सूर्यमुखी, पालक, तुलसी, गाजर आदि) और अदरक मिर्च, मेथी, हल्दी, पुदीना, कढ़+ी पत्ता आदि उगाएं अथवा मनीप्लांट लगाएं।
आग्नेय दिशा से आने वाली सूर्य किरणों को रोकने वाले सभी पेड़ों को हटाएं। इस दिशा में ऊंचे पेड़ न लगाएं
आग्नेय का स्वामी ग्रह शुक्र दाम्पत्य संबंधों का कारक है। अतः इस दिशा के दोषों को दूर करने के लिए अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम और आदर भाव रखें।
घर की स्त्रियों को नए रेश्मी परिधान, सौंदर्य प्रसाधन, सामग्री, सजावट के सामान और गहने आदि देकर हमेशा खुश रखें। यह सर्वोत्तम उपाय है।
प्रत्येक शुक्रवार को गाय को गेहूं का आटा, चीनी और दही से बने पेड़े खिलाएं। प्रतिदिन रसोई में बनने वाली पहली रोटी गाय को खिलाएं। दोषयुक्त आग्नेय में गाय-बछड़े की सफेद संगमरमर से बनी मूर्ति या तस्वीर इतनी ऊंचाई पर लगाएं कि वह आसानी से दिखाई दे।
आग्नेय में शुक्र यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें। दक्षिण दिशा
यदि दक्षिणी क्षेत्र बढ़ा हो, तो उसे काटकर शेष क्षेत्र को वर्गाकार या आयताकार बनाएं। कटे भाग का विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जा सकता है।
यदि दक्षिण में भवन की ऊंचाई के बराबर या उससे अधिक खुला क्षेत्र हो, तो ऊंचे पेड़ या घनी झाड़ियां उगाएं।
इस दिशा में कंक्रीट के बड़े और भारी गमलों में घर में रखने योग्य भारी प्रकृति के पौधे लगाएं।
यमराज अथवा मंगल ग्रह के मंत्रों का पाठ करें।
इस दिशा के स्वामी मंगल को प्रसन्न करने के लिए घर के बाहर लाल रंग का प्रयोग करें। दक्षिण दिशा के दोष अग्नि के सावधानीपूर्वक उपयोग और अग्नि तत्व प्रधान लोगों के प्रति उचित आदर भाव से दूर किए जा सकते हैंं।
इस क्षेत्र की दक्षिणी दीवार पर हनुमान जी का लाल रंग का चित्र लगाएं।
दक्षिण दिशा में विधिपूर्वक मंगल यंत्र की स्थापना करें। नैर्ऋत्य दिशा
नैर्ऋत्य दिशा के बढ़े होने से असहनीय परेशानियां पैदा होती हैं। यदि यह क्षेत्र किसी भी प्रकार से बढ़ा हो, तो इसे वर्गाकार या आयताकार बनाएं।
रॉक गार्डन बनाने अथवा भारी मूर्तियां रखने हेतु नैर्ऋत्य सर्वोत्तम है। यदि यह क्षेत्र नैसर्गिक रूप से ऊंचा या टीलेनुमा हो या इस दिशा में ऊंचे भवन अथवा पर्वत हों, तो इस ऊंची उठी जगह को ज्यों का त्यों छोड़ दें।
यदि नैर्ऋत्य दिशा में भवन की ऊंचाई के बराबर अथवा अधिक खुला क्षेत्र हो, तो यहां ऊंचे पेड़ या घनी झाड़ियां लगाएं। इसके अतिरिक्त घर के भीतर कंक्रीट के गमलों में भारी पेड़ पौधे लगाएं।
इस दिशा में भूतल पर अथवा ऊंचाई पर पानी का फव्वारा बनाएं।
राहु के मंत्रों का जप स्वयं करें अथवा किसी योग्य ब्राह्मण से कराएं। श्राद्धकर्म का विधिपूर्वक संपादन कर अपने पूर्वजों की आत्माओं को तुष्ट करें। इस क्षेत्र की दक्षिणी दीवार पर मृत सदस्यों की एक तस्वीर लगाएं जिस पर पुष्पदम टंगी हों।
मिथ्याचारी, अनैतिक, क्रोधी अथवा समाज विरोधी लोगों से मित्रता न करें। वाणी पर नियंत्रण रखें तांबे, चांदी, सोने अथवा स्टील से निर्मित सिक्के या नाग-नागिन के जोड़े की प्रार्थना कर उसे नैर्ऋत्य दिशा में दबा दें।
नैर्ऋत्य दिशा में राहु यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें। पश्चिम दिशा
यदि पश्चिम दिशा बढ़ी हुई हो, तो उसे काटकर वर्गाकार या आयताकार बनाएं। यदि इस दिशा में भवन की ऊंचाई के बराबर या अधिक दूरी तक का क्षेत्र खुला हो, तो वहां ऊंचे वृक्ष या घनी झाड़ियां लगाएं। इसके अतिरिक्त इस दिशा में घर के पास बगीचे में लगाए जाने वाले सजावटी पेड़-पौधे जैसे इंडोर पाम, रबड़ प्लांट या अंबे्रला ट्री कंक्रीट के बड़े व भारी गमलों में लगा सकते हैं।
भूतल पर बहते पानी का स्रोत अथवा पानी का फव्वारा भी लगा सकते हैं।
पद्म पुराण में उल्लिखित नील शनि स्तोत्र अथवा शनि के किसी अन्य मंत्र का जप और दिशाधिपति वरुण की प्रार्थना करें।
सूर्यास्त के समय प्रार्थना के अलावा कोई भी अन्य शुभ कार्य न करें।
पश्चिम दिशा में शनि यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें।
वायव्य दिशा यदि वायव्य दिशा का भाग बढ़ा हुआ हो, तो उसे वर्गाकार या आयताकार बनाएं अथवा ईशान को बढ़ाएं।
यदि यह भाग घटा हो तो वहां मारुतिदेव की एक तस्वीर, मूर्ति या संकेत चिह्न लगाएं। हनुमान जी की तस्वीर या मूर्ति भी लगाई जा सकती है। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा के चंद्र की एक तस्वीर या चित्र भी लगाएं, दोषों से रक्षा होगी।
वायुदेव अथवा चंद्र के मंत्रों का जप तथा हनुमान चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।
पूर्णिमा की रात खाने की चीजों पर पहले चांद की किरणों को पड़ने दें और फिर उनका सवेन करें। निर्मित भवन से बाहर खुला स्थान हो, तो वहां ऐसे वृक्ष लगाएं, जिनके मोटे चमचमाते पत्ते वायु में नृत्य करते हों।
वायव्य दिशा में बने कमरे में ताजे फूलों का गुलदस्ता रखें।
इस दिशा में एक छोटा फव्वारा या एक्वेरियम (मछलीघर) स्थापित करें। अपनी मां का यथासंभव आदर करें, सुबह उठकर उनके चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें और शुभ अवसरों पर उन्हें खीर खिलाएं।
प्रतिदिन सुबह, खासकर सोमवार को, गंगाजल में कच्चा दूध मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं और शिव चालीसा का पाठ श्रद्धापूर्वक करें।
वायव्य दिशा में प्राण-प्रतिष्ठित मारुति यंत्र एवं चंद्र यंत्र की स्थापना करें। उत्तर दिशा यदि उत्तर दिशा का भाग कटा हो, तो उत्तरी दीवार पर एक बड़ा आदमकद शीशा लगाएं।
यदि उत्तर का भाग घटा हो, तो इस दिशा में देवी लक्ष्मी अथवा चंद्र का फोटो, मूर्ति अथवा कोई संकेत चिह्न लगाएं। लक्ष्मी देवी चित्र में कमलासन पर विराजमान हों और स्वर्ण मुद्राएं गिरा रही हों।
विद्यार्थियों और संन्यासियों को उनके उपयुक्त अध्ययन सामग्री का दान देकर सहायता करें। उत्तर दिशा के स्वामी बुध से अध्ययन सामग्री का विचार किया जाता है।
दिशा में हल्के हरे रंग का पेंट करवाएं। उत्तर क्षेत्र की उत्तरी दीवार पर तोतों का चित्र लगाएं। यह पढ़ाई में कमजोर बच्चों के लिए जादू का काम करता है।
इस दिशा में बुध यंत्र की स्थापना विधिपूर्वक करें। इसके अतिरिक्त कुबेर यंत्र अथवा लक्ष्मी यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा कर स्थापित करें।
इस तरह ऊपर वर्णित ये सारे उपाय सहज व सरल हैं जिन्हें अपनाकर जीवन को सुखमय किया जा सकता है। लक्ष्मी आगमन के विशेष वास्तु उपचार
वास्तु शास्त्र का आधार प्रकृति है। आकाश, अग्नि, जल, वायु एवं पृथ्वी इन पांच तत्वों को वास्तु-शास्त्र में पंचमहाभूत कहा गया है। शैनागम एवं अन्य दर्शन साहित्य में भी इन्हीं पंच तत्वों की प्रमुखता है। अरस्तु ने भी चार तत्वों की कल्पना की है। चीनी फेंगशुई में केवल दो तत्वों की प्रधानता है- वायु एवं जल की। वस्तुतः ये पंचतत्व सनातन हैं। ये मनुष्य ही नहीं बल्कि संपूर्ण चराचर जगत पर प्रभाव डालते हैं। वास्तु शास्त्र प्रकृति के साथ सामंजस्य एवं समरसता रखकर भवन निर्माण के सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। ये सिद्धांत मनुष्य जीवन से गहरे जुड़े हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है- पन्चवाहि वहत्यग्रमेशां प्रष्टयो युक्ता अनु सवहन्त।
अयातमस्य दस्ये नयातं पर नेदियोवर दवीय ॥ 10 /8 ॥
सृष्टिकर्ता परमेश्वर पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि), प्रकाश, वायु व आकाश को रचकर, उन्हें संतुलित रखकर संसार को नियमपूर्वक चलाते हैं। मननशील विद्वान लोग उन्हें अपने भीतर जानकर संतुलित हो प्रबल प्रशस्त रहते हैं। इन्हीं पांच संतुलित तत्वों से निवास गृह व कार्य गृह आदि का वातावरण तथा वास्तु शुद्ध व संतुलित होता है, तब प्राणी की प्रगति होती है। ऋग्वेद में कहा गया है-
ये आस्ते पश्त चरति यश्च पश्यति नो जनः।
तेषां सं हन्मो अक्षणि यथेदं हर्म्थ तथा।
प्रोस्ठेशया वहनेशया नारीर्यास्तल्पशीवरीः।
स्त्रिायो या : पुण्यगन्धास्ता सर्वाः स्वायपा मसि !!
हे गृहस्थ जनो ! गृह निर्माण इस प्रकार का हो कि सूर्य का प्रकाश सब दिशाओं से आए तथा सब प्रकार से ऋतु अनुकूल हो, ताकि परिवार स्वस्थ रहे। राह चलता राहगीर भी अंदर न झांक पाए, न ही गृह में वास करने वाले बाहर वालों को देख पाएं। ऐसे उत्तम गृह में गृहिणी की निज संतान उत्तम ही उत्तम होती है। वास्तु शास्त्र तथा वास्तु कला का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार वेद और उपवेद हैं। भारतीय वाड्.मय में आधिभौतिक वास्तुकला (आर्किटेक्चर) तथा वास्तु-शास्त्र का जितना उच्चकोटि का विस्तृत विवरण ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद में उपलब्ध है, उतना अन्य किसी साहित्य में नहीं।
गृह के मुख्य द्वार को गृहमुख माना जाता है। इसका वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व है। यह परिवार व गृहस्वामी की शालीनता, समृद्धि व विद्वत्ता दर्शाता है। इसलिए मुख्य द्वार को हमेशा बाकी द्वारों की अपेक्षा बड़ा व सुसज्जित रखने की प्रथा रही है। पौराणिक भारतीय संस्कृति के अनुसार इसे कलश, नारियल व पुष्प, केले के पत्र या स्वास्तिक आदि से अथवा उनके चित्रों से सुसज्जित करना चाहिए। मुख्य द्वार चार भुजाओं की चौखट वाला हो। इसे दहलीज भी कहते हैं। इससे निवास में गंदगी भी कम आती है तथा नकारात्मक ऊर्जाएं प्रवेश नहीं कर पातीं। प्रातः घर का जो भी व्यक्ति मुख्य द्वार खोले, उसे सर्वप्रथम दहलीज पर जल छिड़कना चाहिए, ताकि रात में वहां एकत्रित दूषित ऊर्जाएं घुलकर बह जाएं और गृह में प्रवेश न कर पाएं।
गृहिणी को चाहिए कि वह प्रातः सर्वप्रथम घर की साफ-सफाई करे या कराए। तत्पश्चात स्वयं नहा-धोकर मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर एकदम सामने स्थल पर सामर्थ्य के अनुसार रंगोली बनाए। यह भी नकारात्मक ऊर्जाओं को रोकती है। मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर केसरिया रंग से ९ग९ परिमाण का स्वास्तिक बनाकर लगाएं। मुख्य प्रवेश द्वार को हरे व पीले रंग से रंगना वास्तुसम्मत होता है।
खाना बनाना शुरू करने से पहले पाकशाला का साफ होना अति आवश्यक है। रोसोईये को चाहिए कि मंत्र पाठ से ईश्वर को याद करे और कहे कि मेरे हाथ से बना खाना स्वादिष्ट तथा सभी के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक हो। पहली चपाती गाय के, दूसरी पक्षियों के तथा तीसरी कुत्ते के निमित्त बनाए। तदुपरांत परविार का भोजन आदि बनाए।
विशेष वास्तु उपचार—–
निवास गृह या कार्यालय में शुद्ध ऊर्जा के संचार हेतु प्रातः व सायं शंख-ध्वनि करें। गुग्गुल युक्त धूप व अगरवत्ती प्रज्वलित करें तथा क्क का उच्चारण करते हुए समस्त गृह में धूम्र को घुमाएं।
प्रातः काल सूर्य को अर्य देकर सूर्य नमस्कार अवश्य करें।
यदि परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य अनुकूल रहेगा, तो गृह का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। ध्यान रखें, आईने व झरोखों के शीशों पर धूल नहीं रहे। उन्हें प्रतिदिन साफ रखें। गृह की उत्तर दिशा में विभूषक फव्वारा या मछली कुंड रखें। इससे परिवार में समृद्धि की वृद्धि होती है।
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वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय—–
कभी-कभी दोषों का निवारण वास्तुशास्त्रीय ढंग से करना कठिन हो जाता है। ऐसे में दिनचर्या के कुछ सामान्य नियमों का पालन करते हुए निम्नोक्त सरल उपाय कर इनका निवारण किया जा सकता है।
पूजा घर पूर्व-उत्तर (ईशान कोण) में होना चाहिए तथा पूजा यथासंभव प्रातः 06 से 08 बजे के बीच भूमि पर ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर ही करनी चाहिए।
पूजा घर के पास उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में सदैव जल का एक कलश भरकर रखना चाहिए। इससे घर में सपन्नता आती है। मकान के उत्तर पूर्व कोने को हमेशा खाली रखना चाहिए।
घर में कहीं भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखना चाहिए। उसे पैर नहीं लगना चाहिए, न ही लांघा जाना चाहिए, अन्यथा घर में बरकत और धनागम के स्रोतों में वृद्धि नहीं होगी।
पूजाघर में तीन गणेशों की पूजा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा घर में अशांति उत्पन्न हो सकती है। तीन माताओं तथा दो शंखों का एक साथ पूजन भी वर्जित है। धूप, आरती, दीप, पूजा अग्नि आदि को मुंह से फूंक मारकर नहीं बुझाएं। पूजा कक्ष में, धूप, अगरबत्ती व हवन कुंड हमेशा दक्षिण पूर्व में रखें।
घर में दरवाजे अपने आप खुलने व बंद होने वाले नहीं होने चाहिए। ऐसे दरवाजे अज्ञात भय पैदा करते हैं। दरवाजे खोलते तथा बंद करते समय सावधानी बरतें ताकि कर्कश आवाज नहीं हो। इससे घर में कलह होता है। इससे बचने के लिए दरवाजों पर स्टॉपर लगाएं तथा कब्जों में समय समय पर तेल डालें।
खिड़कियां खोलकर रखें, ताकि घर में रोशनी आती रहे।
घर के मुख्य द्वार पर गणपति को चढ़ाए गए सिंदूर से दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।
महत्वपूर्ण कागजात हमेशा आलमारी में रखें। मुकदमे आदि से संबंधित कागजों को गल्ले, तिजोरी आदि में नहीं रखें, सारा धन मुदमेबाजी में खर्च हो जाएगा।
घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखरे हुए या उल्टे पड़े हुए नहीं हों, अन्यथा घर में अशांति होगी।
सामान्य स्थिति में संध्या के समय नहीं सोना चाहिए। रात को सोने से पूर्व कुछ समय अपने इष्टदेव का ध्यान जरूर करना चाहिए।
घर में पढ़ने वाले बच्चों का मुंह पूर्व तथा पढ़ाने वाले का उत्तर की ओर होना चाहिए।
घर के मध्य भाग में जूठे बर्तन साफ करने का स्थान नहीं बनाना चाहिए।
उत्तर-पूर्वी कोने को वायु प्रवेश हेतु खुला रखें, इससे मन और शरीर में ऊर्जा का संचार होगा।
अचल संपत्ति की सुरक्षा तथा परिवार की समृद्धि के लिए शौचालय, स्नानागार आदि दक्षिण-पश्चिम के कोने में बनाएं।
भोजन बनाते समय पहली रोटी अग्निदेव अर्पित करें या गाय खिलाएं, धनागम के स्रोत बढ़ेंगे।
पूजा-स्थान (ईशान कोण) में रोज सुबह श्री सूक्त, पुरुष सूक्त एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें, घर में शांति बनी रहेगी। भवन के चारों ओर जल या गंगा जल छिड़कें।
घर के अहाते में कंटीले या जहरीले पेड़ जैसे बबूल, खेजड़ी आदि नहीं होने चाहिए, अन्यथा असुरक्षा का भय बना रहेगा।
कहीं जाने हेतु घर से रात्रि या दिन के ठीक १२ बजे न निकलें।
किसी महत्वपूर्ण काम हेतु दही खाकर या मछली का दर्शन कर घर से निकलें।
घर में या घर के बाहर नाली में पानी जमा नहीं रहने दें।
घर में मकड़ी का जाल नहीं लगने दें, अन्यथा धन की हानि होगी।
शयनकक्ष में कभी जूठे बर्तन नहीं रखें, अन्यथा परिवार में क्लेश और धन की हानि हो सकती है।
भोजन यथासंभव आग्नेय कोण में पूर्व की ओर मुंह करके बनाना तथा पूर्व की ओर ही मुंह करके करना चाहिए।
वास्तुशास्त्र में कार्यालय प्रबंघन
किसी भी वास्तु खंड में सर्वश्रेष्ठ स्थिति दक्षिण दिशा की मानी गई है। वास्तु संबंघी किसी भी पुराने वास्तुशास्त्र में दक्षिण-पश्चिम को प्रमुख स्थान नहीं दिया गया है।
प्राचीन योजनाओं में दक्षिण-पश्चिम में शस्त्रागार के लिए स्थान बताया है। लगभग सभी शास्त्रों मे वास्तु खंड में दक्षिण दिशा तथा जन्मपत्रिका में दशम भाव (दक्षिण दिशा) को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है
अत: स्वामी, मैनेजिंग डायरेक्टर, चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर या स्वमी की अनुपस्थिति में कार्यालय में द्वितीय स्थान रखने वाले अघिकारी को बैठाना चाहिए। उन्हें यदि उत्तर की ओर मुंह करके बैठाया जाए तो श्रेष्ठ रहता है अन्यथा पूर्व में मुख करके भी बैठाया जा सकता है।
यदि गलती से मुख्य कार्यकारी अघिकारी अग्निकोण में बैठे व उसका अघीनस्थ अघिकारी दक्षिण में बैठे तो थोडे दिनों में ही दोनों का अहम टकराने लगेगा और अघीनस्थ अघिकारी अपने वरिष्ठ की आज्ञा का उल्लंघन करने की स्थिति में आ जाएगा।
इसी भांति यदि मुख्य अघिकारी उत्तर, पश्चिम या पूर्व में बैठे तथा कनिष्ठ अघिकारी दक्षिण, दक्षिण-पूर्व या दक्षिण-पश्चि में बैठे तो भी वरिष्ठतम अघिकारी का नियंत्रण कार्यालय पर नहीं रह पाएगा तथा कार्यालय में अराजकता फैल जाएगी।
वायव्य कोण में बैठने वाले कर्मचारी प्राय: थोडे समय बाद वहां कम बैठना शुरू कर देते हैं तथा कुछ अघिक समय बीत जाने के बाद वे अन्यत्र कहीं नौकरी पकडने की कोशिश करते हैं। उन्हें अघिक वेतन पर काम मिल भी जाता है।
यह कोण माकेटिंग करने वाले व्यक्तियों के लिए श्रेष्ठ है।
कोई भी कार्यालय प्रभारी यह चाहेगा कि माकेर्टिग से संबंघित व्यक्ति हमेशा मार्केट में ही रहे। वायव्य कोण में कुछ गुण ही ऎसा है कि व्यक्ति के मन में उच्चाटन की भावनाएं पैदा होती है, इसीलिए विवाह योग्य कन्याओं के लिए भी यही जगह प्रशस्त बताई गई है परंतु 10वीं, 12वीं में पढने वाली लडकियों के लिए वायव्य कोण में सोना खतरनाक है क्योंकि उनका मन घर में नहीं लगेगा।
अग्निकोण में उन कर्मचारियों को स्थान दिया जा सकता है जिनका दिमागी कार्य है तथा जो शोघ कार्य करते रहते हैं। नित नवीन योजनाएँ बनाने वाले कर्मचारियों को भी वहां स्थान दिया जा सकता है।
टैस्टिंग लेबोरेटरी भी यहां स्थापित की जा सकती है। अग्निकोण में यदि अघिक वर्षो तक बैठना पडे तो स्वभाव में आवेश आने लगता है। इसका नुकसान अघीनस्थ को तो झेलनासंस्थान को भी झेलना पड सकता है।
अग्निकोण में उन्हीं कर्मचारियों को बैठाया जाना चाहिए जिनसे पब्लिक रिलेशंस के कार्य नहीं कराए जाते हों।
ऎसे कर्मचारियों को किसी बीम या तहखाने के ऊपर भी नहीं बैठाया जाना चाहिए।
ईशान कोण में यदि वरिष्ठ अघिकारी बैंठे तो भी उत्तम नहीं माना जाता क्योंकि आवश्यक रूप से अन्य शक्तिशाली स्थानों पर अघीनस्थ कर्मचारियों को बैठना पडेगा। ईशान कोण में अपेक्षाकृत कनिष्ठ एवं उन लोगों को बैठाया जाना चाहिए जो वाक्पटु हों और मुस्कुराकर अभिवादन कर सकें।
प्राय: सभी स्थितियों में कर्मचारियों को उत्तराभिमुख बैठना चाहिए और ऎसा न हो सकते की स्थिति में पूर्वाभिमुख बैठनाचाहिए।
भारी-भरकम अलमारियाँ या रैक्स नैऋत्य कोण में रखा जाना उचित होता है। ऊंचे या भारी सामान को उत्तर या ईशान कोण में रखने से कार्यालय में बाघाएं उत्पन्नहो जाती है।
बीच में, मघ्य स्थान में अर्थात ब्रास्थान में भी भारी-भरकम सामान या स्थायी स्ट्रक्चर नहीं बनाया जाना चाहिए। बीम या गढा भी यहां नहीं होना चाहिए।
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;वास्तु अनुसार कहाँ हो बाथरूम… उत्तर-पूर्व में रखें पानी का बहाव
बाथरूम यह मकान के नैऋत्य; पश्चिम-दक्षिण कोण में एवं दिशा के मध्य अथवा नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य में होना उत्तम है। वास्तु के अनुसार, पानी का बहाव उत्तर-पूर्व में रखें।
जिन घरों में बाथरूम में गीजर आदि की व्यवस्था है, उनके लिए यह और जरूरी है कि वे अपना बाथरूम आग्नेय कोण में ही रखें, क्योंकि गीजर का संबंध अग्नि से है।
चूँकि बाथरूम व शौचालय का परस्पर संबंध है तथा दोनों पास-पास स्थित होते हैं।
शौचालय के लिए वायव्य कोण तथा दक्षिण दिशा के मध्य या नैऋत्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य स्थान को सर्वोपरि रखना चाहिए।
शौचालय में सीट इस प्रकार हो कि उस पर बैठते समय आपका मुख दक्षिण या उत्तर की ओर होना चाहिए। अगर शौचालय में एग्जास्ट फैन है, तो उसे उत्तरी या पूर्वी दीवार में रखने का निर्धारण कर लें। पानी का बहाव उत्तर-पूर्व रखें।
वैसे तो वास्तु शास्त्र-स्नान कमरा व शौचालय का अलग-अलग स्थान निर्धारित करता है,पर आजकल जगह की कमी के कारण दोनों को एक साथ रखने का रिवाज-सा चल पड़ा है।
लेकिन ध्यान रखें कि अगर बाथरूम व लैट्रिन, दोनों एक साथ रखने की जरूरत हो तो मकान के दक्षिण-पश्चिम भाग में अथवा वायव्य कोण में ही बनवाएँ या फिर आग्नेय कोण में शौचालय बनवाकर उसके साथ पूर्व की ओर बाथरूम समायोजित कर लें।
स्नान गृह व शौचालय नैऋत्य व ईशान कोण में कदापि न रखें।
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पश्चिम दिशा में रखें शयनकक्ष—–
बैडरूम कई प्रकार के होते हैं। एक कमरा होता है- गृह स्वामी के सोने का एक कमरा होता है परिवार के दूसरे सदस्यों के सोने का। लेकिन जिस कमरे में गृह स्वामी सोता है, वह मुख्य कक्ष होता है।
अतः यह सुनिश्चित करें कि गृह स्वामी का मुख्य कक्ष; शयन कक्ष, भवन में दक्षिण या पश्चिम दिशा में स्थित हो। सोते समय गृह स्वामी का सिर दक्षिण में और पैर उत्तर दिशा की ओर होने चाहिए।
इसके पीछे एक वैज्ञानिक धारणा भी है। पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव और सिर के रूप में मनुष्य का उत्तरी ध्रुव और मनुष्य के पैरों का दक्षिणी ध्रुव भी ऊर्जा की दूसरी धारा सूर्य करता है। इस तरह चुम्बकीय तरंगों के प्रवेश में बाधा उत्पन्न नहीं होती है।
सोने वाले को गहरी नींद आती है। उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है।
घर के दूसरे लोग भी स्वस्थ रहते हैं।
घर में अनावश्यक विवाद नहीं होते हैं।
यदि सिरहाना दक्षिण दिशा में रखना संभव न हो, तो पश्चिम दिशा में रखा जा सकता है।
स्टडी; अध्ययन कक्ष वास्तु शास्त्र के अनुसार आपका स्टडी रूम वायव्य, नैऋत्य कोण और पश्चिम दिशा के मध्य होना उत्तम माना गया है।
ईशान कोण में पूर्व दिशा में पूजा स्थल के साथ अध्ययन कक्ष शामिल करें, अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होगा। आपकी बुद्धि का विकास होता है। कोई भी बात जल्दी आपके मस्तिष्क में फिट हो सकती है। मस्तिष्क पर अनावश्यक दबाव नहीं रहता।

आकार
वर्गाकार : इस तरह का प्लॉट घर में निवास करने वाले को सुख और संपन्नता प्रदान करता है।
आयताकार : इस तरह का भू खंड मालिक को आर्थिक उन्नति में अत्यन्त सहायक होता है।
अण्डाकार : इस प्रकार की भूमि क्रय करने से बचना चाहिए। इस भूमि पर निर्मित भवन में रहने पर दु:ख और अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
चक्राकार : चक्राकार जमीन का चयन यथा संभव नहीं करना चाहिए। शास्त्रानुसार इस तरह का भूखंड मालिक के धन का नाश करता है।
वृत्ताकार : समृद्धि में निरंतर वृद्धि चाहने के इच्छुक जातकों को ऎसा प्लॉट नहीं लेना
चाहिए क्योंकि इसमें निवास करने से समृद्धि कम होती है। त्रिकोणाकार : इस आकार प्रकार का भू खंड निवास करने वाले मालिक को राजकीय समस्याएं, अस्थिरता और अगिA भय प्रदान करता है।
अर्द्धवृत्ताकार : यह जमीन का टुकड़ा मकान मालिक और इसमें निवास करने वाले जातकों को दु:ख प्रदान करता है।
धनुषाकार : धनुषाकार प्लॉट में निर्मित भवन में निवास करने वाले जातकों में भय पैदा करता है।
समानान्तर चतुर्भुज : इस तरह के भू खंड का चयन नहीं करना चाहिए। अशुभ परिणाम देने वाला तथा दुश्मनी पैदा करने के कारण निवासी सुख से नहीं रह सकता।
गोमुखी : इस तरह का प्लॉट रहने के लिए शुभ होता है किंतु व्यापार के लिए अशुभ होता है।
सिंहमुखी : सिंहमुखी प्लॉट रहने के
लिए अशुभ होता है किंतु व्यापार के लिए शुभ होता है।
भूमि परीक्षण आद्रता : प्राचीन समय में भूमि का आद्रता परीक्षण किया जाता था। भूमि में गbा खोदकर पानी भरा जाता था और भूमि में नमी का पता लगाया जाता था।
दिशा प्रभाव : भूमि पर चार मुखी दीपक जलाकर यह प्रयोग करके यह जानने की कोशिश की जाती थी कि यह चारों वर्णो में से किसके लिए लाभकारी रहेगी।
जीवन्तता : सभी तरह के बीजों को बोकर जमीन की उपजाऊ सामथ्र्य का अनुमान लगाया जाता था।
विकिरण : सफेद, लाल, पीले और काले रंगों के फूलों का परीक्षण करके फूलों पर रेडियम का प्रभाव देखकर आकलन किया जाता था कि यह जमीन किस वर्ण के लिए शुभ है।
वायु संचरण : धूल उड़ाकर देखा जाता था कि हवा का रूख और उसके प्रभाव क्या रहेंगे।
इन परिणामों के आधार पर चारों वर्णो में से किसके लिए भू खंड उपयुक्त रहेगा, उसके अनुसार भूमि में गर्भविन्यासविधानम् के द्वारा ऊर्जा बतायी जाती थी।
विज्ञान के युग में हम लेबर एंटिना की मदद से कॉस्मिक एवं टेलटिक ऊर्जा की स्थिति का पता लगा लेते हैं। गृह स्वामी के लिए रेडिशियन कैसे हैं, पता कर लेते हैं। साथ ही हमें जिस प्रकार की ऊर्जा अलग अलग कमरों में बनानी होती है वैसी ऊर्जा हम यंत्रों, नगों, इत्रों, मिनरल्स, जडियों आदि द्वारा बनाकर घर को ऊर्जावान बनाकर सभी की कार्यक्षमता बढ़ा लेते हैं। कार्यक्षमता बढ़ने से घर में सुख-समृद्धि का आगमन और उल्लास का वातावरण बनता है। घर में किसी चीज की कमी नहीं होने से प्रेम बना रहता है।
घर के इंटीरियर में परदों की विशेष भूमिका है। अलग-अलग रंग के परदे घर को और भी ज्यादा खूबसरत बनाने में विशेष महत्व है। घर में सही रंग के परदे लगाकर आप अपने घर के वातावरण को शांतिपूर्ण बनाया जा सकता है।
साथ ही अनुकूल रंग के परदे लगाने से सौभाग्य में वृद्धि होती है साथ ही प्रतिकूल परिस्थितियां अनुकूल होने लगाती है।
– परदे हमेशा दो पर्तो वाले लगाएं।
– पश्चिम दिशा में यदि परदें लगाना हो तो सफेद रंग के परदे लगाएं।
-उत्तर दिशा के कमरे में नीले रंग के परदे लगाएं।
-दक्षिण दिशा के कोने का कमरा हो तो लाल रंग के परदे उपयुक्त रहेंगे।
-पूर्व दिशा का कमरा हो तो हरे रंग के परदे ठीक रहेंगे।
– पूर्वी कोने में यदि कमरा हो तो हल्के पीले या ओरेंज रंग के परदे लगाएं।
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वास्तु में सुधार——– घर का द्वार यदि वास्तु के विरुद्ध हो तो द्वार पर तीन मोर पंख स्थापित करें ,
मंत्र से अभिमंत्रित कर पंख के नीचे गणपति भगवान का चित्र या छोटी प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए मंत्र है-ॐ द्वारपालाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:
यदि पूजा का स्थान वास्तु के विपरीत है तो पूजा स्थान को इच्छानुसार मोर पंखों से सजाएँ, सभी मोर पंखो को कुमकुम का तिलक करें व शिवलिं की स्थापना करें पूजा घर का दोष मिट जाएगा,
प्रस्तुत मंत्र से मोर पंखों को अभी मंत्रित करें मंत्र है-ॐ कूर्म पुरुषाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा: यदि रसोईघर वास्तु के अनुसार न बना हो तो दो मोर पंख रसोईघर में स्थापित करें,
ध्यान रखें की भोजन बनाने वाले स्थान से दूर हो, दोनों पंखों के नीचे मौली बाँध लेँ, और गंगाजल से अभिमंत्रित करें मंत्र-ॐ अन्नपूर्णाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:
और यदि शयन कक्ष वास्तु अनुसार न हो तो शैय्या के सात मोर पंखों के गुच्छे स्थापित करें, मौली के साथ कौड़ियाँ बाँध कर पंखों के मध्य भाग में सजाएं, सिराहने की और ही स्थापित करें, स्थापना का मंत्र है मंत्र-ॐ स्वप्नेश्वरी देव्यै नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:
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वास्तुशास्त्र में पूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण तथा अग्रेय,नैऋत्य,वायव्य एवं ईशान्य-इन आठों ही दिशाओं-उपदिशाओं का महत्व है। वास्तुशास्त्र के आधार पर किसी को प्लॉट,बंगला,मकान या बड़ी इमारत बनानी हो या रहने के लिए जाना हो तो सर्वप्रथम उस जगह की दिशाओं को विचार करना आवश्यक है। प्लॉट,बंगला,इमारत या इमारत के अंदर के ब्लॉक का प्रवेशद्वार किस दिशा में है-इसका विचार करना चाहिए। पूर्व दिशा आमतौर पर सूर्योदयवाली मानी जाती है किंतु केवल सूर्योदय की दिशा को पूर्व दिशा न मानकर दिशाबोधक यंत्र के माध्यम से ही दिशा निश्चित करनी चाहिए। पृथ्वी सूर्य के इर्द-गिर्द घूमती रहने से उदित सूर्य की पूर्व दिशा में थोड़ा अंतर हो सकता है। किंतु चुंबकीय गुणोंवाले दिशाबोधक यंत्र के उपयोग से पूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण के संबंध में अचूक अनुमान लगाया जा सकता है।

विषुववृत्त की मूल कल्पना के अनुसार,पृथ्वी का दायरा बदलता रहता है और इसी कारण प्रोसीजर ऑफ दक्विनॉक्स की पद्धति का अध्ययनकरने कम्पस की रचना की गई। इसी कारण इस यंत्र द्वारा इंगित की गई दिशा मं सौ प्रतिशत ठीक होती है। जिस प्रकार मानव-जीवन में अंकों का महत्व है,उसी प्रकार यही बात दिशाओं के संबंध में भी लागू होती है। व्यक्ति पर होनेवाले या हो रहे अच्छे-बुरे प्रभाव को हम महसूस करते है। इसी पद्धति से सूर्य के इर्द-गिर्द के परिभ्रमण,उसका दिशाओं पर होनेवाले प्रभाव और सूर्य किरणों का व्यक्ति पर होनेवाला प्रभाव भी ध्यान में लेने की जरूरत है। विश्वविख्यात भविष्यवेत्ता कीरो ने अपनी पुस्तक कनसेपशन्स में उपरोक्त बात की पुष्टि की है। हिंदू संस्कृति के उपासक ऋषि-मुनियों ने भी इस बात का उल्लेख किया है।
उनकी हजारों वर्ष पहले लिखी बातों को पढ़कर और उन्हें सत्य सिद्ध होता देखकर आज हमें अचंभा होता है। उपरोक्त सभी बातों का एक ही निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्ति के जीवन में दिशाओं का अत्यधिक महत्व है। वह किस दिशा में बने मकान में रहता है? जिस घर में वह रहता है उस मकान का दरवाजा किस दिशा में है?
उसके मकान की आंतरिक साज-सज्जा कैसी है? इस बातों से उस व्यक्ति की संपन्नता या विपन्नता का पता आसानी से लग जाता है। इसी तरह मकान में कौन-कौन से परिवर्तन किए जाएं कि रहनेवालों का भला हो सके और जो बुरा हो रहा है या होनेवाला है उस पर रोक लगे।
प्रमुख रूप से दिशाओं की विस्तृत जानकारी पुस्तक में हम आपको अन्यत्र देंगे।
पूर्व,पश्चिम,उत्तर एवं दक्षिण मुख्य दिशाएं हैं। आग्रेय,नैऋत्य,वायव्य एवं ईशान्य- ये चार उपदिशाएं है। हर दिशा एवं उपदिशा के अपने खास गुण-दोष हैं। इन गुण-दोषों के अनुसार फल मिलते रहते हैं। हर दिशा का एक स्वामी या देवता माना गया है।
पूर्व:- पूर्व दिशा को प्राची भी कहा जाता है। इस दिशा का स्वामी इंद्र है। इंद्र को देवों का राजा और हर कार्य में दक्ष माना गया है तथा वेदों में भी स्थान दिया गया है।
शत्रुओं का नाश करनेवाला यह बहुरूपिया इंद्र ब्रह्मदेव के मुंह से उत्पन्न हुआ है। यह अपनी मर्जी से किसी भी आकार या रूप में प्रकट हो सकता है। वर्षा का देवता भी इंद्र ही है। यही कारण है कि जब वर्षा नहीं होती तब मानव इंद्र से प्रार्थना करते है।
मरूत का मतलब है हवा,यह हवा उसकी सहायक होती है। धन,धान्य,पशु,इत्यादि की वृद्धि के लिए इंद्रोपासना की परम आवश्यकता है। इंद्र का निवास स्वर्ग में है।
उसकी राजधानी अमरावती है और वाहन ऐरावत नामक हाथी है। उसके घोड़े का नाम उच्च्श्रवा और शस्त्र वज्र है। सूर्य,अग्रि,इंद्र,जयन्त,ईश,पर्जन्य,सत्य,भूप एवं आकाश आदि देवताओं को निवास पूर्व दिशा में है।
पश्चिम:- पश्चिम का अर्थ है बाद में। व्यावहारिक भाषा में कहा जाए तो उदय होने के बाद जिस जगह उसकी अस्त होता है वह दिशा। इस दिशा में कोई भी कार्य आगे नहीं बढ़ पाता,पनप नहीं पाता।
इस दिशा का स्वामी वरूण है। इस दिशा पर अगस्त्य ऋषि का प्रभाव है। निवास समुद्र है। पानी परी इनका प्रभाव रहता है। उत्तर:- इस दिशा का स्वामी या देवता है।
कुबेर का अर्थ है-आनेवाली या होनेवाली घटना पर नियंत्रण एवं हमेशा बढ़ोतरी करनेवाला। संस्कृत में कुत्सित वेट शरीरं यस्यस: कहा गया है। इसके पास ऐश्वर्य का भंडार तथा अकूत धन रहता है।
यक्ष एवं किन्नरों का यह राज है। रूद्र इसका मित्र है।
कैलाश पर्वत पर इसका निवास है इसके तीन पैर,आठ हाथ और एक आंख की जगह पीले रंग का बिंदु है।
इसका ग्रह बुध है,हर महीने के कृष्णपक्ष में इसका प्रभाव अधिक होता है। कुबेर,दिती,आदिती,शैल,नाग एवं भल्लाट आदि देवताओं का निवास इसके पास होता है। दक्षिण:- इस दिशा का स्वामी या देवता यम है। यह सूर्यपूत्र है।
विष्णु इसके शत्रु है। भरणी नक्षत्र इसके लिए महत्वपूर्ण है।
इस नक्षत्र का प्रभाव आश्विन एवं कार्तिक मास के अंतिम 8-8 दिन अधिक रहता है। मानव जीवन को क्षीण बनानेवाली यह दिशा है। दक्षिण दिशा का स्वामी यह होने से दक्षिण दिशा सभी शुभ कार्यों के लिए वज्र्य मानी गई है। यम,गंधर्व,मृग,पूषा,वितथ और क्षत आदि देवताओं का निवास दक्षिण दिशा में रहता है।
अग्रेय:- पूर्व एवं दक्षिण के मध्य के कोण को आग्रेय कहा गया है। इस दिशा का स्वामी अग्रि है,इसीलिए अपने नाम अनुसार यह अग्रेय कहलाती है। महर्षि व्यास द्वारा लिखे गए अठारह पुराणों में वशिष्ठ ऋषि द्वारा कथित 14,500 श�ोकों का जिसमें अंतर्भाव है,उसी को अग्रिपुराण की संज्ञा प्राप्त है।
ऋगवेद की कई ऋचाओं के अनुसार अग्रि और इंद्र जुड़वां भाई हैं। यद्यपि अग्रि अमर है,फिर भी मानव का घर उसका अतिथि गृह है। सभी समारोहों का अधिपत्य इसी के पास है। अग्रि सबका त्राता और संरक्षक है। अग्रि भक्तिभाव और पुजा-अर्चना करनेवाले मानव की भावना को आकाश में बसे उसके ईश्वर तक पहुंचाता है। इस कल्पना में वाईब्रेशन थ्योरी कार्यरत रहती है। अग्रि का अस्तित्व आकाश में सूर्य भगवान के कारण,वातावरण में बिजली के कारण और पृथ्वी पर ज्योति या ज्वाला के कारण रहता है। अग्रि प्राणिमात्र की सभी बातों से परिचित है और वह सभी पर कृपा करती है।
अग्रि उपासक व्यक्तिआर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ और दीर्घायु होता है। अग्रि में आहुति देनेवाले मनुष्य की चिंता स्वयं अग्रि करती है।
यज्ञ-याग,होम-हवन करनेवाले मानव को अग्रि सुख-शांति,संतान एवं समृद्धि प्रदान करती है। यह बात ऋगवेद में स्पष्ट की गई है।
इसीलिए सुबह-शाम सूर्योदय एवं सूर्यास्त के कुछ क्षण पहले अग्रिहोत्र करने का प्रावधान है।
इस संदर्भ मे निम्र श�ोक का उद्धरण यहां प्रासंगिक है: सप्तहस्तचतु: शंृग सप्तजिव्हि द्विशीर्षक: त्रियात् प्रसन्न-वदन: सुखीसीन: शुचिस्मित: स्वाहां तु दक्षिणं पाश्र्वे देवो वामें स्वधांतथा बिभ्रद दक्षिणहस्तैस्तु शक्तिमननं सृचं श्रृवं तोमरं व्यंजनं वामैघतपात्रे च धारयन् आत्माभिमुखमासोनं एवं रूपो हुताशन: कराली धमिनो श्वेता लोहिता नोललोहिता सुवर्णा पद्मरागाइति विभावसों: सप्तजिव्हानामानि पोजा श्वेतो आरशा घूमा तोक्ष्णा स्फुलिंगिनो ज्वलिनो ज्वालिनी इति कुशाना: नव शक्तय:
महाभारत मे अनुशासन पर्व में पेड़ में अग्रि के अस्तित्व की बात कही गई है। कोई भी मकान बनाते समय उसका पहला स्तंभ या रसोईघर की जगह हमेशा आग्रेय दिशा में ही होनी चाहिए। यह वास्तुषास्त्र का पहला और महत्वपूर्ण नियम है। हर महीने का पहला दिन अग्रि तत्व स्वरूप होता है।
नैऋत्य:- दक्षिण एवं पश्चिम के मध्य का कोण नैऋत्य है। इस दिशा की स्वामिनी या देवता नैऋति है।
इसका मूलार्थ है-पुन:-पुन: होना-चाहे वह मनुष्य का जन्म हो या कोई अन्य घटना।
नैऋति से तात्पर्य है कि उचित समय पर उचित बात या घटना न हो तो उसका पुनर्निर्माण कभी नहीं होता। ऐसी दिशा में अगर मकान बनाया जाए तो गड्ढे खोदने पड़ते हैं,इसका अर्थ यह है कि इस दिशा में मकान बनने पर निरंतर उसका क्षरण होता रहेगा। नैऋत: यानी असुर या क्रुर कर्म करनेवाला व्यक्ति।
ऋगवेद में इस संदर्भ निम्र श�ोक है: भयमप्रथो द्वेगादाचरंव्युनैऋतो दधे:।
इस दिशा का गुणधर्म नाश करना है,बुरे काम करना है।
मकान की नेऋत्य दिशा कभी खाली नहीं रखनी चाहिए और न ही भूखंड के नैऋत्य में कोई गड्ढा ही खोदना चाहिए।
यह दिशा असुर,क्रूर कर्म करनेवाली शक्ति यास भूत-पिशाच की दिशा है। इसलिए यह दिशा कभी भी खाली या रिक्त न रखें। भूखंड में अशुभ एवं कष्टकारी बातों का संचय न हो इसलिए इस दिशा में गड्ढा खोदना निषेध है।
किसी कारणवश गड्ढा खोदना पड़े तो उससे अच्छे फल देेनेवाले वृक्ष लगाएं या फिर वह गड्ढा बंद करवा दें।
वायव्य:- उत्तर तथा पूर्व दिशा के मध्य कोण को वायव्य की संज्ञा दी गई है। इस दिशा का स्वामी या देवता वायु है। प्राण,अपान,समान,व्यान ओर उदान-इन पांच प्रकार के वायु की आवश्यकात मनुष्य जीवन के लिए अपरिहार्य है। हनुमान या भीम इसके प्रतीक स्वरूप हैं। अठारह पुराणों में वायुपुराण नामक एक अलग पुराण है। वायु यानी हनुमान का पूजन या भक्ति उपासना करनेवाले को, उसके जीवन में अविलंब फल प्राप्त होते हैं-यह अनुभव सिद्ध बात है।
ईशान्य:- उत्तर और पूर्व दिशा के मध्य का कोण ईशान्य कहलाता है। इस दिशा का स्वामी या देवता स्वयं ईश्वर है। श्री भगवान शंकर इस दिशा के अधिपति हैं इसका अस्त्र पाशुपत है। आद्र्रा नक्षत्र इसका द्योतक प्रतीक है। सेमल का वृक्ष इस दिशा में शुभ माना जाता है।
इस दिशा के देवता का ध्यान स्मरण करने से मनुष्य में कई गुण उत्पन्न होते हैं।
सभी प्रकार की दैवी शक्तियां इस दिशा को पवित्र रखने से प्राप्त होती हैं।
इस दिशा में मकान बनाने से उसमें रहनेवालों को धन-यश-संपत्ति एवं सभी प्रकार की श्रेष्ठता प्राप्त होती है।
ईशान्य दिशा में सूर्य की जो किरणें फैलती हैं उन्हे अल्ट्रा वायलेट रेज कहा जाता है।
इन किरणों को मनुष्य के उपचारार्थ काम में लाया जाता है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने इस अदृश्य शक्ति को कई नामों से संबोधित किया है।
इस दिशा को कई नाम और प्रतीक दिए गए हैं यथा-नीलकंठ,अत्युग्रु,शशिखर,नागेंद्रहार,त्रिनयन,अतिंद्रिय,गंगाधर,नागेंद्रकाय,सहस्राक्षर,सुक्ष्म,ज्वल-त्रिशूल,शंकर,वज्रदंष्ट्र,अनंत,गंडमल।
इन नामें का गहराई से अध्ययन करने पर उनके गुणधर्म और परिणामों की जानकारी प्राप्त होती है। महान भारतीय ज्ञानियों व संतों ने पंचमहाभूतों के आधार पर जिस अद्भुत ज्ञान को समाज के कल्याण के लिए सदियों पहले अपनाया था, वह था वास्तुशास्त्र जो आज भी दुर्घटनाओं और संपत्ति के नुकसान को रोकने के लिए व्यक्तियों की मदद करता है।

कई बार दिखने में सब कुछ ठीक ठाक लगने के बावजूद भी पर्याप्त सफलता नहीं मिल पाती तथा हाथ लगती है तो केवल हताशा और निराशा ।
मेगास्टार चिरंजीवी को अपने प्रशंसकों के चलते चुनावों से बहुत अधिक उम्मीद थी, और वे खुद को जीता हुआ समझ रहे थे।
पर वे अपमानजनक तरीके से चुनाव हार गए। इसके बाद लोगों ने चुनाव में हार के कारणों को खोजना शुरूकिया और काफी खोजबीन के बाद यह पता चला कि यह सब वास्तु दोष की वजह से है।
परिणामस्वरूप वास्तु के अनुसार घर में कुछ आवश्यक फेरबदल के साथ-साथ मेगा स्टार चिरंजीवी को भविष्य में समृद्धि हेतु सामने के मुख्य द्वार वाले मार्ग का उपयोग करने की सलाह दी, जबकि अब तक वे कार्यालय में आने जाने के लिए घर के पिछवाड़े वाले मार्ग का उपयोग कर रहे थे।

इन वास्तु परिवर्तनों ने अपेक्षित परिणाम दिया——

इस प्रकार हम देखते हैं कि वास्तु जाने अनजाने में हमारे परिवेष तथा हमारे जीवन पर अपना पूर्ण प्रभुत्व रखता है।
आज वास्तु का संबंध केवल घर, आफिस अथवा निर्माण कायों तक ही सीमित नहीं हैं।
बल्कि यह तो प्राकृतिक उर्जा को संतुलित करने वाला ऐसा ज्ञान है जिससे जीवित व अजीवित दोनों प्रकार की वस्तुओं का नियंत्रण किया जा सकता है।
इंसान यदि सकारात्मक चेष्टा करे तो उसके लिए कुछ भी कर पाना संभव है।
सकारात्मक चेष्टा के लिए उचित प्रयास व सकारात्मक ज्ञान की आवश्यकता होती है।
फिल्म व्यवसाय जहां भवन के रूप में आॅफिस से लेकर स्टूडियो तथा मेकअप से लेकर अभिनय तक के क्रिया कलाप होते है। वहां हर समय बहुत अधिक उर्जा की आवश्यकता होती है।
ऐसे में सिनेमा से जुड़े लोगों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी और साथ ही उनके परिवेश की उर्जा को संतुलित रखा जाय।
इसके लिए वास्तु संबंधी कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि आप अभिनेता हैं तो आपको अभिनय करते हुए हमेशा पूरब अथवा दक्षिण पूर्व हिस्से का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए। इस दिशा से अभिनय करने वाले का मुख पूरब की ओर होना चाहिए।
क्योंकि दक्षिण पूर्व की दिशा शुक्र की दिशा है और शुक्र सिनेमा, रंगमंच व मीडिया के क्षेत्र के नियंता है।
शुक्र ग्रह का संबंध सांसारिक सुखों, रास, रंग, भोग, ऐश्वर्य, आकर्षण तथा लगाव से है।
शुक्र दैत्यों के गुरु हैं और कार्य सिद्धि के लिए साम-दाम-दण्ड-भेद के प्रयोग से भी नहीं चूकते।
सौन्दर्य में शुक्र की सहायता के बिना सफलता असंभव है।
ऐसा अधिकतर देखा गया है कि शुक्र ग्रह से प्रभावित युवक व युवतियां फिल्मों में काफी सफल रहे हैं। कुछ अन्य ग्रह जो कुछ दूर तक तो इनका सहयोग करते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे प्रतियोगियों के ग्रह भारी पड़ते हैं, कमजोर ग्रह वाले प्रतिभागी पिछड़ने लगते हंै।
यह सच है कि फिल्मों की सफलता के निर्णायक लोग जो आम इंसान होते हैं, भी शनि, मंगल, गुरु जैसे ग्रहों से प्रभावित होते हैं।
अतः उन्हें प्रभावित करने के लिए शुक्र का मजबूत होना जरूरी है, और इसके लिए परिवेश का वास्तु सही चाहिए।
फिल्म व सौन्दर्य शास्त्र का विधान पूरी तरह से वास्तु, ज्योतिषकर्म और चिकित्सकों के पेशे जैसा ही है।
ऐसे में निर्णायक जन समुदाय शुक्र से प्रभावित तो होते हैं लेकिन उन पर गुरु-चंद्रमा का भी प्रभाव होता है जो उन्हें विवेकवान बनाता है।
अभिनय एवं संगीत में दक्षता प्रदान करने वाला ग्रह शुक्र ही है। शुक्र सौन्दर्य, प्रेम, कलात्मक अभिरुचि, नृत्य, संगीतकला एवं बुद्धि प्रदान करता है। अभी कलियुग का 5109 वां वर्ष चल रहा है। इस समय कलियुग और शुक्र ग्रह की युति सौंदर्य के विश्वव्यापी बाजार के मूल में है।
अतः इस दौर में मिलने वाली सफलता ने लोगों को फिल्म, टेलीविजन और विज्ञापन के साथ संबद्ध कर दिया है।
ऐसे में सिनेमा से जुड़े लोगों को कुछ आवश्यक बातो का खास ध्यान रखना चाहिए।
कभी भी दक्षिण पश्चिम और उत्तर पश्चिम दिशा में टेलीफोन न रखें और न ही इन दिशाओ में इसका प्रयोग कर। ऐसा करने से आप दिक्भ्रमित हो सकते हैं।
फोन को दक्षिण पूर्व अथवा पर्व दिशा में रखना अच्छा होता है।
फिल्म का व्यवसाय शुक्र ग्रह से जुड़ा है। शुक्र की दिशा दक्षिण पूरब की दिशा है अतः महत्वपूर्ण दस्तावेज, फाइलें व कागजात इसी दिशा में अथवा ईषान कोण में रखी जानी चाहिए।
कलाकारों के लिए श्वेत रंग के परिधान धारण करना उत्तम व शुभ माना जाता है।
इसलिए यदि शूटिंग आदि में अधिक जरूरी न हो तो श्वेत और काले रंग के कपड़े ही पहनें।
रत्न में यदि हीरा धारण करे तो उत्तम फल की प्राप्ति निश्चित है।
क्योंकि हीरा शुक्र का प्रिय रत्न है। अतः इसके धारण करने से मीडिया व सिनेमा में वांक्षित सफलता की संभावना प्रबल हो जाती है।
गाय की पूजा करें और घर में बांसुरी रखें।
फिल्म से जुड़े व्यक्ति द्वारा चांदी, सोना, चावल, घी, श्वेत वस्त्र, सफेद घोड़़़ा, दही और मिश्री का प्रयोग करने से सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
पूरी दुनिया भर में फिल्म से जुडे स्थान व उनका परिवेशएक विशेष प्रकार की उर्जा से युक्त होते हैं।
जिनके आस पास रहने वाले लोगों की दिनचर्या व प्रकृति में एक प्रकार का विशिष्टीकरण देखा जाता है।
मिलान, मुंबई, पेरिस, लाॅस एंजिल्स आदि शहर फिल्म, फेशन और सौंदर्य के लिए जाने जाते हंै।
इन सफल नगरों की अवस्थिति वृहत जल राशी के समीप अथवा समुद्र के पास है। जल तत्व चंद्रमा के प्रभाव में होने से सौंदर्य और समृद्धि का कारण बनता है। इसी वजह से दुनिया में फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े स्थान जहां भी जल तत्व का प्राचुर्य है धन और संपत्ति की संपन्नता है। किंतु इस उद्योग की सफलता और धन वृष्टि ने दांपत्य जीवन में किसी तीसरे की संभावना को बढ़ाया है। और यही वजह कि ऐसे शहर टूटते रिश्तो के दर्द से पीड़ित हैं। जिसका प्रभाव उनकी आने वाली पीढ़ी पर भी पड़ रहा है।
पति पत्नी के रिश्तो में किसी तीसरे के आने से परिवार बिखर रहे हैं। ऐसे में यदि थोड़ी सी आध्यात्मिक व वास्तु संबंधी सावधानी बरती जाय तो इस अनचाही मुसीबत से छुटकारा पाया जा सकता है। उपरोक्त चर्चा से यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि सिनेमा जगत जहां एक ओर समाज के लिए कुछ अच्छा करने हेतु अभिप्रेत है। वहीं वह अपनी आधारभूत गलतियों की वजह से पीड़ित व व्यथित भी है। इससे अवसाद व बिगड़ते रिश्तो को अनजाने में कहीं बढ़ावा न मिले, इसके लिए सजग व जागरूक होने की आवश्यकता है। और इसके लिए हमें अपने उत्कृष्ट प्राचीन ज्ञान-वास्तु का सहारा लेने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।
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वास्तुशास्त्र का उदभव ‘वैदिक शास्त्रों में वास्तु का अर्थ है गृह निर्माण योग्य भूमि—–
अर्थात् जिस भूमि पर अधिक सुरक्षा व सुविधा प्राप्त हो सके, इस प्रकार के मकान को भवन व महल आदि जिसमें मनुष्य रहते हैं या काम करते हैं वास्तु कहते है।
इस ब्रह्मण्ड में सबसे शाक्तिशाली प्राकृति है क्योंकि यही सृष्टि का विकास करती है।
यही ह्रास प्रलय, नाशा करती है।
वास्तु शास्त्र इन्हीं प्राकृतिक शाक्तियों का अधिक प्रयोग कर अधिकतम सुरक्षा व सुविधा प्रदान करता है।
ये प्राकृतिक शाक्तियां अनवरत चक्र से लगातार चलती रही है।
(1) गुरूत्व बल, (2) चुम्बकीय शाक्ति, (3) सौर ऊर्जा पृथ्वी में दो प्रकार की प्रावृति शक्तियां हैं।
(1) गुरूत्व बल, (2) चुम्बकीय शक्ति गुरूत्व :- गुरूत्व का अर्थ है पृथ्वी की वह आकर्षण शक्ति जिससे वह अपने ऊपर आकाश में स्थित वजनदार वस्तुओं को अपनी ओर खींच लेती है।
उदाहरण के लिए थर्मोकोल व पत्थर का टुकडा। ऊपर से गिराने पर थर्मोकोल देरी से धरती पर आता है जबकि ठोस पत्थर जल्दी आकर्षित करती है। इसी आधार पर मकान के लिए ठोस भूमि प्रशांत मानी गई है।
चुम्बकीय शक्ति :-
यह प्राकृति शक्ति भी निरन्तर पुरे ब्राह्मण्ड में संचालन करती है। सौर परिवार के अन्य ग्रहों के समान पृथ्वी अपनी कक्षा और अपने पर घुमने से अपनी चुम्बकीय शक्ति को अन्त विकसित करती है। हमारा पुरा ब्रह्मण्ड एक चुम्बकीय क्षेत्र है। इसके दो ध्रुव है। एक उत्तर, दूसरा दक्षिण ध्रुव। यह शक्ति उत्तरसे दक्षिण की ओर चलती है।
सौर ऊर्जा :-
पृथ्वी को मिलने वाली ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत सूर्य है। यह एक बडी ऊर्जा का केन्द्र है। सौर ऊर्जा पूर्व से पश्चिम कार्य करती है। पंच महाभूतों का महत्व दर्शन, विज्ञान एवं कला से संबंधित प्राय सभी शास्त्र यह मानते है कि मानव सहित सभी प्राणी पंचमहाभूतों से बने हैं। अत: मानव का तन, मन एवं जीवन इन महाभूतों के स्वत: स्फूर्त और इनके असन्तुलन से निश्क्रिय सा हो जाता है।

वास्तु शास्त्र में इन्हीं पॉंच महाभूतों का अनुपात में तालमेल बैठाकर प्रयोग कर जीवन में चेतना का विकास संभव है।
(1) क्षिति (2) जल (3) पावक (4) गगन (5) समीरा अर्थात् , पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश।
धरती :-
धरती के बिना जीवन एवं जीवन की गतिविधियों की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
जल :-
जीवन के लिए जल की आवश्यकता होती है।
जल ही जीवन है। इस सृष्टि से यह शास्त्र भवन निर्माण हेतु कुआं, नलकूप, बोरिंग, नल, भूमिगत टंकी, भवन के ऊपर पानी की टंकी आदि का विचार करना।
अग्नि :-
जीवन में पृथ्वी, जल के बाद अग्नि का क्रम आता है। जिस प्रकार मानव जीवन में जब तक ताप है, गर्मी है तब तक जीवन है इसके ठण्डा पडते ही जीवन समाप्त हो जाता है। अग्नि तत्व प्रकाश के रूप में ऊर्जा का संचार कारता है।
वायु :-
वायु की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, वायु के बिना जीवन संभव नहीं है। तब तक वायु सक्रिय व शुद्ध है ? तब तक जीवन है।
आकाश :-
पंचमहाभूतों में आकाश का महत्व कम नहीं है। यह चारों तत्वों में सब से बड़ा और व्यापक है। इसका विस्तार अनन्त है। आकाश ही न होता तो जीवन ही नहीं होता।
वास्तु और विज्ञान सूर्य की ऊर्जा को अधिक समय तक भवन में प्रभाव बनाए रखने के लिए ही दक्षिण और पश्चिम भाग की अपेक्षा पूर्व एवं उत्तर के भवन निर्माण तथा उसकी सतह को नीचा रखे जाने का प्रयास किया जाता है।

प्रात:कालीन सूर्य रशिमयों में अल्ट्रा वॉयलेट रशिमयों से ज्यादा विटामिन ”डी” तथा विटामिन ”एफ” रहता है

। वास्तु शास्त्र में भवन का पूर्वी एवं उत्तरी क्षेत्र खुला रखने का मुख्य कारण यही है कि प्रात:कालीन सूर्य रशिमयों आसानी से भवन में प्रविष्ट हो सकें। इसी प्रकार दक्षिण और पश्चिम के भवन क्षेत्र को ऊचां रखने या मोटी दीवार बनाने के पीछे भी वास्तु शास्त्र का एक वैज्ञानिक तथ्य है। क्योकि जब पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दक्षिण दिशा में करती है तो उस समय पृथ्वी विशेष कोणीय स्थिति लिए होती है। अतएव इस भाग में अधिक भार होने से सन्तुलन बना रहता है और सूर्य के अति ताप से बचा जा सकता है। इस प्रकार इस भाग में गर्मियों में ठण्डक और सर्दियों में गरमाहट बनी रहती है।
खिड़कियों और दरवाजें के बारे में भी वास्तु शास्त्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता है। इसलिए भवन के दक्षिण या पश्चिम भाग में पूर्व या उत्तर की अपेक्षा छोटे एवे कम दरवाजे खिड़कियाँ रखने के लिए कहा जाता है, ताकि गर्मियों में इस क्षेत्र में कमरों में ठण्डक तथा सर्दियों में गरमाहट महसूसकी जा सके। वास्तु शास्त्र के अनुसार रसोईघर को आगनेय यानी दक्षिण-पूर्व दिशा में रखा जाना चाहिए।
इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि इस क्षेत्र में पूर्व से विटामिन युक्त प्रात:कालीन सूर्य की रशिमयों तथा दक्षिण से शुद्ध वायु का प्रवेश होता है, क्योंकि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा दक्षिणायन की ओर करती है।
अत: इस कोण की स्थिति के कारण भवन के इस भाग को विटामिन ”डी” एवं विटामिन ”एफ” से युक्त अल्ट्रा वॉयलेट किरणें अधिक समय तक मिलती हैं।
इससे रसोईघर में रखी खाद्य सामग्री लम्बे समय तक शुद्ध रहती है। वास्तु शास्त्र पूजाघर या आराधना स्थल को उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में बनाने के लिए भी वैज्ञानिक तथ्य देता है। पूजा के समय हमारे शरीर पर अपेक्षाकृत कम वस्त्र या पतले वस्त्र होते हैं, ताकि प्रात:कालीन सूर्य रशिमयों के माध्यम से विटामिन ‘डी` हमारे शरीर में प्राकृतिक रूप से प्रविष्ट हो सके।
उत्तरी क्षेत्र में हमें पृथ्वी की चुम्बकीय ऊर्जा का अनुकूल प्रभाव प्राप्त होता है।
इस क्षेत्र को सबसे अधिक पवित्र माना गया है, क्योंकि इसके द्धारा अंतरिक्ष से अलौकिक शक्ति प्राप्त होती है।
यही मुख्य कारण है कि मंदिरों एवं साधना स्थलों के प्रवेश द्वार इन्हीं दिशाओं में बनाए जाते हैं।
हमारे वायुमण्डल में 20 प्रकार के मैग्नेटिक फील्ड पाए जाते हैं वैज्ञानिकों के मतानुसार, इनमें से चार प्रकार के मैग्नेटिक फील्ड हमारी शारीरिक गतिविधियों को ऊर्जा प्रदान करने में अत्यंत सहायक होते हैं।
वास्तु शास्त्र ने भी अपने क्रिया-कलापों में इनकी व्यापक सहायता ली है।
बिना तोड़-फोड़ के वास्तु सुधार आजकल पूर्व निर्मित गृह को वास्तु अनुसार करने हेतु तरह-२ की सलाह दी जाती है जो ठीक जो है लेकिन उसको कार्य रूप देना हर परिवार या इंसान के लिए एक कठिन कार्य हो गया है।
जैसा कि विज्ञान ने आज बहुत ज्यादा उन्नति कर ली है उसी तरह वास्तु विज्ञान में भी आज बिना किसी तोड़-फोड़ किए उसमें सुधार करने के नए-नए तरीके सुझाये जा सकते हैं।
उपरोक्त दोषों के मूल निवारक इस प्रकार हैं :-
1वास्तु दोष निवारक यन्त्र।
2सिद्ध गणपति स्थापना।
3पिरामिड यन्त्र। ४ हरे पौधे। ५ दर्पण। ६ प्रकाश। ७ शुभ चिन्ह। ८ जल। ९ क्रिस्टल बाल। १०रंग। ११घंटी। १२ बांसुरी । १३स्वास्तिक यन्त्र। १४ वास्तुशांति हवन। १५ मीन। १६शंख। १७ अग्निहोत्र।
हमारे पहले वास्तु दोषों को समझना होगा ये निम्न प्रकार के होते हैं :-
१ भूमि दोष :- भूमि का आकार, ढ़लान उचित न होगा। भूखण्डकी स्थिति व शल्य दोष इत्यादि। भवन निर्माण दोष :- पूजा घर, नलकूप, (जल स्त्रोत), रसोई घर, शयनकक्ष, स्नानघर, शौचालय इत्यादि का उचित स्थान पर न होना।
भवन साज-सज्जा दोष :- साज-सज्जा का सामान व उचित चित्र सही स्थान पर न रखना।
४ आगुन्तक दोष :- यह नितांत सत्य है कि आगुन्तक दोष भी कभी-
२ आदमी की प्रगति में बाघा उत्पन्न करता है वह उसको हर तरह से असहाय कर देता है।
इस दोष से बचने हेतु मुख्य द्वार पर सिद्ध गणपति की स्थापना की जा सकती है। उपरोक्त दोषों को किसी भी वास्तु शास्त्री से सम्पर्क कर आसानी से जाना जा सकता है।
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वास्तुदोष निवारक यन्त्र :——-

वास्तु दोषों के विभिन्न दिशाओं में होने से उससे सम्बन्धित यन्त्र उपयोग में लाकर उन दोषों का निवारण किया जा सकता है। इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि यन्त्र जानकर व्यक्ति द्वारा विधि पूर्वक बनाये गये हों व उनकी शुद्धि भी कर ली गई हो।
यन्त्र का उपयोग किसी भी जानकर वास्तुशास्त्री से सलाह लेकर विधि पूर्वक करना चाहिए।
मुख्य यन्त्र :——

पूर्व में दोष होने पर – सूर्य यन्त्र पूर्व की तरफ स्थापित करें।

पश्चिम में दोष होने पर – वरूण यन्त्र या चन्द्र यन्त्र पूजा में रखें।
दक्षिण में दोष होने पर – मंगल यन्त्र पूजा में रखें।
उत्तर में दोष होने पर – बुध यन्त्र पूजा में रखें।
ईशान में दोष होने पर – ईशान में प्रकाश डालें व तुलसी का पौधा रखें।
पूजा में गुरू यन्त्र रखें।
आग्नेय में दोष होने पर – प्रवेश द्वार पर सिद्ध गणपति की स्थापना एवं शुक्र यन्त्र पूजा में रखें।
नैरूत में दोष होने पर – राहु यन्त्र पूजा में स्थापित करें।
वायव्य में दोष होने पर – चन्द्र यन्त्र पूजा में रखें।
उपरोक्त के अलावा अन्य भी कई यन्त्र हैं, जैसे व्यापार वृद्धि यन्त्र, वास्तुदोष नाशक यन्त्र, श्री यन्त्र इत्यादि।
वास्तुदोष नाशक यन्त्र को द्वार पर लगाया जा सकता है।
भूमि पूजन के समय भी चांदी के सर्प के साथ वास्तु यन्त्र गाड़ा जाना बहुत फलदायक होता है।
विभिन्न प्रकार के आवासीय कक्ष आधुनिक जीवन के आवासीय भवनो में अनेक प्रकार के कक्षों – रसोईघर, शौचालय, शयन कक्ष, पूजाघर, अन्न भण्डार, अध्ययन कक्ष, स्वागत कक्ष आदि का अपना-अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है।
ऐसे में इन कक्षों आदि को किस दिशा में बनाना उपयोगी होगा यह भी जानना अति आवश्यक है।
स्थान निर्धारण ——
अब हम विभिन्न आवश्यक कक्षों का निर्धारण उनकी दिशा-विदिशा सहित निम्नवत् सारिणी द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं
– कक्षों के नाम वास्तु सम्मत दिशा एवं कोण रसोईघर आग्नेय कोण में शयन कक्ष दक्षिण दिशा में स्नानघर पूर्व दिशा में भोजन कराने का स्थान पश्चिम दिशा में पूजाघर ईशान कोण में शौचालय नैर्ऋत्य कोण में भण्डार घर उत्तर दिशा में अध्ययन कक्ष नैर्ऋत्य कोण एवं पश्चिम दिशा के बीच स्वागत कक्ष या बैठक पूर्व दिशा में पशुघर वायव्य कोण में तलघर या बेसमेंट पूर्व या उत्तर दिशा में चौक भवन के बीच में कुआं पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं ईशान कोण में घृत-तेल भण्डार दक्षिणी आग्नेय कोण में अन्य वस्तु भण्डार दक्षिण दिशा में अन्न भण्डार पश्चिमी वायव्य कोण में एकांतवास कक्ष पश्चिमी वायव्य कोण में चिकित्सा कक्ष पूर्वी ईशान कोण में कोषागार उत्तर दिशा
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वास्तु में द्वार व अन्य वेध—–

मुख्य द्वार से प्रकाश व वायु को रोकने वाली किसी भी प्रतिरोध को द्वारवेध कहा जाता है अर्थात् मुख्य द्वार के सामने बिजली, टेलिफोन का खम्भा, वृक्ष, पानी की टंकी, मंदिर, कुआँ आदि को द्वारवेध कहते हैं। भवन की ऊँचाई से दो गुनी या अधिक दूरी पर होने वाले प्रतिरोध द्वारवेध नहीं होते हैं।
द्वारवेध निम्न भागों में वर्गीकृत किये जा सकते हैं-

कूपवेधः—- मुख्य द्वार के सामने आने वाली भूमिगत पानी की टंकी, बोर, कुआँ, शौचकूप आदि कूपवेध होते हैं और धन हानि का कारण बनते हैं। स्तंभ वेधः मुख्य द्वार के सामने टेलिफोन, बिजली का खम्भा, डी.पी. आदि होने से रहवासियों के मध्य विचारों में भिन्नता व मतभेद रहता है, जो उनके विकास में बाधक बनता है।
स्वरवेधः—– द्वार के खुलने बंद होने में आने वाली चरमराती ध्वनि स्वरवेध कहलाती है जिसके कारण आकस्मिक अप्रिय घटनाओं को प्रोत्साहन मिलता है। चूल मजागरा (Hinges) में तेल डालने से यह ठीक हो जाता है।
ब्रह्मवेधः—- मुख्य द्वार के सामने कोई तेलघानी, चक्की, धार तेज करने की मशीन आदि लगी हो तो ब्रह्मवेध कहलाती है, इसके कारण जीवन अस्थिर व रहवासियों में मनमुटाव रहता है। कीलवेधः मुख्य द्वार के सामने गाय, भैंस, कुत्ते आदि को बाँधने के लिए खूँटे को कीलवेध कहते हैं, यह रहवासियों के विकास में बाधक बनता है।
वास्तुवेधः—– द्वार के सामने बना गोदाम, स्टोर रूम, गैराज, आऊटहाऊस आदि वास्तुवेध कहलाता है जिसके कारण सम्पत्ति का नुकसान हो सकता है।
मुख्य द्वार भूखण्ड की लम्बाई या चौड़ाई के एकदम मध्य में नहीं होना चाहिए, वरन किसी भी मंगलकारी स्थिती की तरफ थोड़ा ज्यादा होना चाहिए। मुख्य द्वार के समक्ष कीचड़, पत्थर ईंट आदि का ढेर रहवासियों के विकास में बाधक बनता है।
मुख्य द्वार के सामने लीकेज आदि से एकत्रित पानी रहने वाले बच्चों के लिए नुकसानदायक होता है। मुख्य द्वार के सामने कोई अन्य निर्माण का कोना अथवा दूसरे दरवाजे का हिस्सा नहीं होना चाहिए।
मुख्य द्वार के ठीक सामने दूसरा उससे बड़ा मुख्य द्वार जिसमें पहला मुख्य द्वार पूरा अंदर आ जाता हो तो छोटे मुख्य द्वार वाले भवन की धनात्मक ऊर्जा बड़े मुख्य द्वार के भवन में समाहित हो जाती है और छोटे मुख्य द्वारवाला भवन वहाँ के निवासियों के लिए अमंगलकारी रहता है।
मुख्यद्वार के पूर्व, उत्तर या ईशान में कोई भट्टी आदि नहीं होना चाहिए और दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय अथवा नैऋत्य में पानी की टंकी, खड्डा कुआँ आदि हानिकारक है।
यह मार्गवेध कहलाती है और परिवार के मुखिया के समक्ष रूकावटें पैदा होने का कारक है।
भवन वेधः— मकान से ऊँची चारदीवारी होना भवन वेध कहलाता है। जेलों के अतिरिक्त यह अक्सर नहीं होता है। यह आर्थिक विकास में बाधक है। दो मकानों का संयुक्त प्रवेश द्वार नहीं होना चाहिए। वह एक मकान के लिए अमंगलकारी बन जाता है।
मुख्यद्वार के सामने कोई पुराना खंडहर आदि उस मकान में रहने वालों के दैनिक हानि और व्यापार-धंधे बंद होने का सूचक है।
छाया-वेधः—- किसी वृक्ष, मंदिर, ध्वजा, पहाड़ी आदि की छाया प्रातः 10 से सायं 3 बजे के मध्य मकान पर पड़ने को छाया वेध कहते हैं।

यह निम्न 5 तरह की हो सकती है—–
मंदिर छाया वेधः—-
भवन पर पड़ रही मंदिर की छाया शांति की प्रतिरोधक व व्यापार व विकास पर प्रतिकूल प्रभाव रखती है। बच्चों के विवाह में देर व वंशवृद्धि पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
ध्वज छाया वेधः—
ध्वज, स्तूप, समाधि या खम्भे की छाया के कारण रहवासियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
वृक्ष छायावेधः
भवन पर पड़ने वाली वृक्ष की छाया रहवासियों के विकास में बाधक बनती है।
पर्वत छायावेधः—-
मकान के पूर्व में पड़ने वाली पर्वत की छाया रहवासियों के जीवन में प्रतिकूलता के साथ शोहरत में भी नुकसानदायक होती है। भवन कूप छायावेधः—- मकान के कुएँ या बोरिंग पर पड़ रही भवन की छाया धन-हानि की द्योतक है।
द्वारवेध के ज्यादातर प्रतिरोध जिस द्वार में वेध आ रहा है उसमें श्री पर्णी∕सेवण की लकड़ी की एक कील जैसी बनाकर लगाने से ठीक होते पाये गये हैं।

OM GURUDEVAY NAMAH

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YOGI BABA Ji
Address : Yogi baba Vashikaran Dham, Mukti Dham Ashram, Shamsan Ghat, Har ki Pauri, Haridwar, Uttrakhand.
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